उनकी आहटों पर फिर फिसला
मेरी तमन्नाओं का हार है
खिसक रहे थे जो सपनें
आज हाँथ में आया वही लम्हात है…..
प्रेम-पिपासु हूँ जी भर के
पिला दे साकी
टपक रही जो तेरे
होठों से शराब है…
खिसक रहे थे जो सपने
Comments
4 responses to “खिसक रहे थे जो सपने”
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Good
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Nice
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धन्यवाद
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Very nice
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