तमाशा

हम तुम पले – बढ़े अपने ही भारत के गोद में।
फिर क्यों दरार पड़ी है आज अपने ही रिश्ते में।।
देखो कैसे चली आज चारो तरफ नफरत की आँधी।
कैसे क़त्ल पे क़त्ल कर रहे अमानुष मनुष्य के भेष में।।
हम किसी से कम नहीं बस यही घमण्ड है सभी को।
चिराग जलाओ भटक गये है इंसान नफरत के भीड़ में ।।
आज अपने ही घर में आग लगा कर चिल्लाते है ‘बचाओ’।
परेशान हो गए आज हम और तुम अपने ही समाज में ।

Comments

10 responses to “तमाशा”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    वाह

    1. Praduman Amit

      धन्यवाद।

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    आजकल जो घटित हो रहा है उसका यथार्थ चित्रण
    बहुत ही सराहनीय

    1. Praduman Amit

      धन्यवाद सर जी।

  3. Geeta kumari

    Very nice

    1. Praduman Amit

      शुक्रिया गीता जी।

    1. Praduman Amit

      धन्यवाद नेहा जी।

  4. Satish Pandey

    देश के भीतर अशान्ति फैलाने वाले, हत्या, डकैती, दुराचार, आतंक फैलाने वाले तत्वों द्वारा की जा रही हरकतों पर चिंता व्यक्त की गई है। वास्तविकता का चित्रण है। ‘कैसे क़त्ल पे क़त्ल कर रहे अमानुष मनुष्य के भेष में’ अनुप्रास से अलंकृत पंक्तियाँ हैं।
    सुन्दर

  5. अशांति को प्रकट करती हुई रचना

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