बेचारी नींद

बात ऐसी हो गई कि
नींद नहीं आएगी ; हमें आज।
वो लोयल नहीं, ढोंगी थे,
उजागर हुई , मगर ये बात।

आंखों से वो बड़े भोले लगते,
शर्म हया का ,क्या नाटक करते !
भ्रम मिटा, चलो  ये आज,
नींद बेचारी कैसे आए ?
धोखा मिला है हमें जनाब  !
                          –मोहन सिंह मानुष

Comments

10 responses to “बेचारी नींद”

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      Thank you 🙏

  1. Geeta kumari

    Nice lines

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      Thank you

    2. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      🙏

  2. Satish Pandey

    किसी पर विश्वास हो और उनका सच कुछ और निकले तो मन व्यथित हो जाता है, नींद गायब हो जाती है, उसी संवेदना को स्वर मिला है, ‘लोयल’ अंग्रेजी शब्द अर्थात निष्ठावान को जल में मिठास की तरह घोला गया है।

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      सर जी बधाईयां आपको! बहुत अच्छी समीक्षा करते हो आप
      बहुत-बहुत धन्यवाद

  3. आपकी या रचना किसी तारीफ या आलोचना समीक्षा की मोहताज नहीं अपने आप में सर्वतो समेटे हुए या रचना मुझे इतनी भाया गई है कि मैं बार-बार पढ़ता हूं

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