एहसास कराने आई तू

मुझको मेरे होने का एहसास कराने आई तू।
फिर से जीवन जीने का आस जगाने आई तू ।
तुझे देख खुद को देखती,तुझसे ही खुद को परखती
देख तुझे मै और निरखती,तुझ संग मैं भी संवरती
पढने और पढाने का एहसास जगाने आई तू —-
आज मेरी भी एक पहचान बनी है
वो तुझसे तेरे ख़ातिर अरमान बनीं हैं
चाहे जितनी तकलीफ उठाऊँ
तेरे सारे ख्वाइश पूरी कर जाऊँ
मुझको मेरी दृढ़ता का आभास कराने आई तू—
तू ना होती तो क्या मैं यह न होतीं
पास मेरे ,मेरी अपनी पहचान न होती
यह कविता न, यह कवयित्री न होती
मुझसे जुङे असंख्य अरमान न होती
हाँ तू मुझको मेरा आधार दिलाने आई तू–

सुमन आर्या

Comments

6 responses to “एहसास कराने आई तू”

  1. Geeta kumari

    सुंदर रचना

    1. Suman Kumari

      धन्यवाद धन्यवाद ।

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बेहतरीन रचना

  3. सुंदर भाव

  4. Satish Pandey

    अतिसुन्दर

  5. बहुत ही उम्दा

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