परतंत्रता की बेड़ियाँ जो थी, वो हमारे महान क्रान्तकारी तोड़ गये ।

परतंत्रता की बेड़ियाँ जो थी, वो हमारे महान क्रान्तकारी तोड़ गये ।
स्वतंत्रता की नीब को जो खाक़ में मिलाना चाहता था, वो खूद ही जमीं में सिमट गये ।
बाकी जो हिन्द को अधीन करना चाहता था, उसको हमारे धरतीपुत्रों ने सुला दिया ।
भारत की जमीं है यारों बंजर हो फिर भी सुपुत उगाती है, भारत का हर एक लाल मिट्टी को माता समझता है ।।1।।

उस देश को मत कभी कमजोर समझना, जिस देश में हर एक युवा खूद को भगत सिंह कहते है ।
हर एक बुजुर्ग वीर कुँवर की गाथा गाते है, हर एक बाला वीर वीरागंनी झाँसी होती है ।
उस देश के मजदूर तो क्या उनके परिस्थियाँ भी उनको मजबुत बनाता है ।
पाषण को पुज-पुजके जिस देश के नर पत्थर को देवता बनाता है, वह देश भारत कहलाता है ।।2।।

टुटते नहीं यहाँ कभी इंसानियत रिश्ते, हर रोज दीनों को देने वाले सोने-चाँदी देते है ।
यहाँ के भिखारी भी खूद को सौभाग्यशाली समझते है, जो भारत देश में रहते है ।
भारत की पहचान ये नहीं कि आज ये नग्नता फैलाकर विकास चाहे और देशों की तरह ।
ये तो सदियों से अखण्ड, विश्वगुरू महान ऋषि-मुनियों का देश है, चाणक्य, कबीर इनके फूल है ।।3।।

खिलते है इनके बगियाँ में फूल मगर मजाल है किसी का तोड़ तो इसे, यही बात प्रकृति की शान होती है ।
पुष्ष की अलिभाषा पूछकर ही माली, फूलों को वीरपुत्रों के राह पे बिछाते है ।
मिट्टी के टुकड़ा-टुकड़ा धरतीपुत्रों को सहनशीलता का पाठ पढ़ाती है ।
धन्य है वह देश हमारा, जिसमें मीरा,कबीर, नानाक की वाणी गुंजती है ।।4।।

Comments

3 responses to “परतंत्रता की बेड़ियाँ जो थी, वो हमारे महान क्रान्तकारी तोड़ गये ।”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    तुम लिखते बहुत हो
    पर पढ़ते नहीं।
    ऐसे तो कवि कोई
    कविता गढ़ते नहीं।।

    1. सही कहा आपने

  2. विकास जी आपको दो दिन पहले ही एक कवि महोदय ने “नींव” लिखना सिखाया था, आज फिर आपने “नीब’ लिखा है, कवि बनने से पहले शब्दों को सीखिए, हिंदी के साथ गलत मत कीजिये

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