पूरा का पूरा भीग जाऊं

रिम झिम बर्षा
बरसे जा
भीतर का
सारा जल उड़ेल दे ,
ऐसे उड़ेल दे कि ऊपर की परत छिन्न-भिन्न न होने पाये
तेरा प्रवाह मेरी नाजुक परत को छिल कर
दूर बह न जाए,
बल्कि मेरे भीतर समा जाए गहरे,
पूरा का पूरा भीग जाऊं
बाहर से अंदर तक,
फिर नयी कोमल
कोपल उगे मेरे भीतर से
तेरे प्रेम की। …….

Comments

10 responses to “पूरा का पूरा भीग जाऊं”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति

    1. धन्यवाद जी

  2. कुछ लोग बारिश को महसूस कर पाते है बाक़ी सब सिर्फ़ भीगते है
    सुन्दर लेखन के लिए आपको बधाई

    1. धन्यवाद जी

  3. अतिसुंदर रचना

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद जी

  4. Kumar Piyush

    गजब, सुंदर

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद

  5. MS Lohaghat

    waah ji waah

    1. Satish Pandey

      Thanks

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