प्रतिस्पर्धा

एक ही प्रतिस्पर्धा में अलग अलग स्वाद मिलते हैं
इसी से पर मुश्किल से मंजिलों के ख्वाब पलते हैं

लक्ष्य है निर्माण कि स्वतंत्रता सब अनुभव कर सके
बीमारी गरीबी और अज्ञानता भूत की बात बन सके

चैन से बैठें नहीं जब तक की लक्ष्य हासिल न हो
गंतव्य तक पहुंचें कि सब के लिए पथ मुमकिन हो

सोंच से ही बनते तो महान चाहे लोग हों या कि देश
अच्छी सोंच से ही हो पाता सफल कोई भी काम नेक

Comments

7 responses to “प्रतिस्पर्धा”

  1. Satish Pandey

    वाह, बहुत ही सुन्दर

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति

  3. सुंदर अभिव्यक्ति

  4. Suman Kumari

    निर्माण की
    बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति भाई जी

  5. Geeta kumari

    बहुत सुंदर रचना

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