तेरी अदा

सावन की बदरी सी बरसी
जो तेरे जुल्फो से बूंदे,
कच्चे मकां सा मेरा
ये दिल ढह गया।।

मदिरा के जाम सी छलकी
जो तेरी आंखों से मस्ती,
शराबी सा बदन मेरा
ये झूमता ही रह गया।।

पूनम के चांद सी बिखरी
जो तेरे होठों से मुस्कान,
गहरे समुंद्र सा मै
लहरों में बदल गया।।

स्वर्ग की अप्सरा सी निखरी
जो तेरी हर एक अदा,
जब भी देखा बस
देखता ही रह गया।।

किस- किस अदा का तेरी
जिक्र मै करूं,
एक – एक अदा पे तेरी
मै कईं बार मर गया।।
अनुज कौशिक

Comments

10 responses to “तेरी अदा”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    लाजवाब

    1. धन्यवाद् सर

  2. Geeta kumari

    सुंदर उपमानों से भरी सुंदर रचना।

    1. जी धन्यवाद, आप भी काफी अच्छा लिखती हैं।

      1. बहुत बहुत शुक्रिया 🙏….वैसे अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।हौसला अफजाई के लिए बहुत शुक्रिया जी

  3. Prayag Dharmani

    श्रृंगार काव्य का अच्छा उदाहरण

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