रोने वाले पापा (कहानी)

                         रोने वाले पापा

                               मुकुल कितना भी गुस्सा हो ,मगर जब भी वह अपनी बेटी से मिलता हमेशा खुश और जिंदादिली दिखाता । दिनभर की उसकी सारी थकान  एक ही सेकंड में फुर हो जाती थी ।

आजकल काम की वजह से मुकुल काफी परेशान रहने लगा था ।वहीं थोड़ी सी सैलरी और बहुत सारे खर्चे ,बिजली का बिल ,खाने का राशन ,पापा की गालियां और साध्वी की चिक चिक बाजी ।

ऐसी बहुत सारी बातें थी जो उसके दिमाग में पूरा दिन चलती रहती थी। बस  दो लोग थे घर में जिनसे उसको कोई शिकवा नहीं होता था उसकी मां और उसकी प्यारी सी नन्ही बेटी ; नैंसी।

चार महीने की बेटी नैंसी अपनी किलकारियां और अपनी मधुर चिल्लाहट से अपने पापा को भी बच्चा बना देती थी और पापा उसके प्यार में मगन होकर सारी दुनिया के काम झाम को भाड़ में कर देते ।

साध्वी का यह अद्भुत गिफ्ट मुकुल के लिए किसी एंजेल से कम नहीं था और पापा- बेटी के प्यार को देखकर साध्वी को भी कभी कभार ईर्ष्या होती थी क्योंकि मुकुल आजकल साध्वी से इतना प्यार नहीं जताता था जितना कि वह अपनी बेटी को। फिर भी साध्वी उन दोनों की नजर उतारती ।

साध्वीं  काफी समय से अपने माइके जाना चाहती थी पर गर्भावस्था के कारण वह नहीं जा पाई और अब मुकुल के पास कोई जवाब नहीं होता था ।

वो किसी भी शर्त पर नैंसी से दूर नहीं हो सकता था, पर मां की जबरदस्ती और पापा की गालियों  के सामने उसकी एक ना चली और साध्वीं का मायके जाना निश्चित हो चुका था ; उधर मुकुल का बुरा हाल था ।
मां कह रही थी कुछ ही दिनों की तो बात है, बेटा आजाएगी ; फिर ले आना कुछ दिन बाद में ।

मुकुल उदास सा मन करके ऑफिस चला जाता है और फिर जब श्याम को घर आया तो घर का माहौल कुछ बदला बदला सा दिखाई दे रहा था और उसकी नजरें किसी को ढूंढ रही थी
पर नन्ही परी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। उसे जिस बात का डर था वही हुआ।

अचानक मां आकर पानी देते हुए कहती है : -“बेटा राकेश आया था और साध्वी अच्छे से पहुंच गई है वहां सब ठीक-ठाक है।”
अच्छा ठीक  है, यह कहकर मुकुल जल्दी से अंदर अपने रूम में जाता है और झट से फोन निकालता है।

फिर अपनी नन्ही परी की फोटो देखकर, भावुक हो जाता है
“बेटा तुम्हारी मम्मी कितनी बुरी है! कैसे रहूंगा मैं तुम्हारे बिन? मिस कर रहा हूं मेरी छोटी गुड़िया!”
उसकी आंखे अखरूओं से भर गई थी और दरवाजे के पास खड़ी मां  देखकर हंस रही थी और उसके मन में द्वंद्व  चल रहा था वह प्रसन्न हो या परेशान!

“मुकुल तू नन्हा मुन्ना कब से बन गया!”  मां ने मुस्कुराते हुए कहा।
चलो नहा लो और फिर बात कर लेना फोन पर,
मगर मुकुल पर जूं नहीं रेंग रही थी ,वह तो अब भी बेटी के ख्यालो में खोया था।…..
                      
                      ——मोहन सिंह मानुष

Comments

9 responses to “रोने वाले पापा (कहानी)”

  1. Geeta kumari

    Very nice पापा और बेटी के प्यार की सुंदर कहानी।

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar

      कहानी पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद मैडम जी
      सादर आभार 🙏🙏🙏

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      Thank you

  2. This comment is currently unavailable

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      हार्दिक धन्यवाद जी

  3. Pratima chaudhary

    पापा का बेटी के लिए इतना गहरा प्रेम!
    बहुत ही बेहतरीन

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