संवेदनाओं की माला

संवेदनाएं कहाँ रहती हैं आज-कल,
मैं यह जानती नहीं..

लोग क्यों जलाते हैं नफरत
के चिराग
मैं यह जानती नहीं..

ऊब चुकी हूँ जिन्दगी
से अपनी,
साँसों की डोर कब
टूटेगी
मैं यह जानती नहीं…

संवेदनशील मुद्दों पर
लोग मौन धारण कर लेते हैं
करते हैं क्यों ऐसा
मैं यह भी जानती नहीं..

मरती है मानवता जब
निहत्थे होकर सड़कों पर
चुप हो जाते हैं क्यों सब
यह भी जानती नहीं…

टूट जाती हैं जब संवेदनाओं की माला
क्यों बिखर जाती है मानवता
मैं यह जानती नहीं…

Comments

14 responses to “संवेदनाओं की माला”

  1. Praduman Amit

    भावपूर्ण रचना।

    1. Pragya Shukla

      🙏

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    लोग आजकल झूठे, स्वार्थी, खुदगर्ज, फरेबी,पाखण्डी इत्यादि हो गए हैं इस वजह से सब की संवेदना समाप्त हो जाती है
    बेहतरीन प्रस्तुति

    1. Pragya Shukla

      🙏🙏

  3. सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. Pragya Shukla

      धन्यवाद

    1. Pragya Shukla

      🙏🙏

    2. Pragya Shukla

      धन्यवाद

  4. vivek singhal

    This comment is currently unavailable

  5. Geeta kumari

    सच है कि कुछ लोगों की संवेदनाएं मर चुकी हैं।
    लेकिन ज़िन्दगी में कुछ लोग अच्छे भी मिलते हैं।
    हां जिनकी संवेदनाएं मर चुकी है ,उन लोगों के बारे में अच्छा चित्रण किया है।

    1. Pragya Shukla

      🙏🙏

  6. बहुत ही उम्दा

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