चल दिये क्यों फेर कर मुँह

चल दिये क्यों फेर कर मुँह
राह में हम भी खड़े थे,
आपसे मिल लेंगे दो पल
चाह में हम भी खड़े थे।
मुस्कुराकर आपने
गैरों में खुशियों को लुटाया,
हम रहे तन्हा, गमों में
अश्रुपथ भीतर बनाया।

Comments

16 responses to “चल दिये क्यों फेर कर मुँह”

  1. Geeta kumari

    वाह, बहुत सुंदरता से अपने भावों को व्यक्त किया है।

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद जी

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar

    सुन्दर प्रस्तुति

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद सर

    1. Satish Pandey

      Thank you

    1. Satish Pandey

      Thank you शास्त्री जी

  3. सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद है आपको

    1. Satish Pandey

      Thanks ji

    1. Satish Pandey

      Thank you ji

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