जो भी हो मन में,
देखो कुछ भी छिपाना मत ।
मैं हर भावो को खुद ही समझ जाऊँगा
देखो लोचन पे लाना मत ।
कभी तुमने ही कहा तो था
सच बताने
गर सच बताया तो
दामन छुङाना मत।
कयी गम हैं इन पलकों पर
बताया तो
पलकों को रूलाना मत।
देखो तुम रूठे तो जग रूठा
मैं रूठू , मुझे मनाना मत।
छिपाना मत
Comments
16 responses to “छिपाना मत”
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NICE
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बहुत बहुत धन्यवाद
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बहुत खूबसूरत
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बहुत सुंदर
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बहुत बहुत धन्यवाद
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सुन्दर
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बहुत बहुत धन्यवाद
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Wah bhot sunder 👏👏
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बहुत बहुत धन्यवाद
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वाह बहुत खूब
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बहुत बहुत धन्यवाद
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बहुत बहुत धन्यवाद
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Nice
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बहुत बहुत धन्यवाद
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बहुत ही उम्दा रचना
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सादर धन्यवाद
समझ में नहीं आ रहा इतनी सारी टिप्पणियों को एक साथ कैसे सहेजू।
एकबार पुनः आभार ज्ञापित करती हूँ प्रतिमाजी
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