बुराइयों की जड़े
हम काटते ही नहीं ,
बुराइयों की जड़ें,
पालते हैं ,पोषते हैं ,
कभी इच्छाओं के लोभ से,
कभी रूपयों की चाह से,
जब लगता है ,
वह जड़े हमें बांधती है,
हम उठ खड़े होते हैं,
अपने विचारों के ;औजार लेकर
दौड़ते हैं, काटते हैं ,
जब क्षमता होती नहीं ,
हमारे भीतर; उसे मिटाने की..
Sunder
धन्यवाद सर
बहुत ही बेहतरीन
बहुत अच्छा संदेश देने का सफल प्रयास
बहुत बहुत धन्यवाद सर
समाज का यथार्थ चित्रण। सुन्दर प्रस्तुति
बहुत बहुत धन्यवाद
Nice
Thank you
sundar
धन्यवाद