क्यों कुछ कहते नहीं,
सब गूंगे बहरे बैठे हैं ,
सबके भीतर जलती है आग,
फिर क्यों खामोश बैठे हैं,
खो दिया है सम्मान को ,
अपने भीतर के इंसान को,
तभी तो चुप ही रहते हैं,
होती है वारदातें आंखों के सामने ,
फिर क्यों ,आवाज दबाए रहते हैं।
क्यों कुछ कहते नहीं।
Comments
16 responses to “क्यों कुछ कहते नहीं।”
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अच्छी
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Thank you
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सच को कहती बहुत ही सुंदर रचना
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बहुत बहुत धन्यवाद
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Nice
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धन्यवाद
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Nice lines
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बहुत बहुत धन्यवाद
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बहुत ही सुंदर भाव है।
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धन्यवाद सर
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वाह वाह
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धन्यवाद जी
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Very nice
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Thank you
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अतिसुंदर
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धन्यवाद 😊
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