बड़े शहर की जिंदगी…
बड़े शहर की जिंदगी को छोड़ ,
अब छोटे शहर की जिंदगी को,
जीकर देख रहे हैं
यहां भी लोग हैं; वहां भी लोग थे,
यहां सोच बड़ी, वहां सोच छोटी ,
न निभाते हैं रिश्ते को,
न जानते हैं इंसानियत को,
कौन आपका अपना है,
कौन आपका पराया,
पर जुड़े हैं अब भी सब,
रुपए की चाह में,
हैसियत की छांव में…….
शहरीकरण और ग्रामीण जीवन में अंतर ,सोंच में अंतर बखूबी बयां किया है प्रतीमाजी ।
बहुत बहुत धन्यवाद 🙏
तुलनात्मकता के साथ बड़ी सहजता से आपने भाव रखें हैं और अपनी श्रेष्ठ काव्य प्रतिभा का प्रदर्शन किया है
इतनी सुंदर समीक्षा व मेरे काव्य का सम्मान करने के लिए हार्दिक धन्यवाद आपका प्रज्ञा जी
अतिसुंदर
Thank you sir
शहरीजीवन और ग्रामीण जीवन अद्भुत सच्चाई
बहुत-बहुत धन्यवाद भाई मेरी रचनाओं को अपना कीमती समय देने के लिए