बड़े शहर की जिंदगी को छोड़ ,
अब छोटे शहर की जिंदगी को,
जीकर देख रहे हैं
यहां भी लोग हैं; वहां भी लोग थे,
यहां सोच बड़ी, वहां सोच छोटी ,
न निभाते हैं रिश्ते को,
न जानते हैं इंसानियत को,
कौन आपका अपना है,
कौन आपका पराया,
पर जुड़े हैं अब भी सब,
रुपए की चाह में,
हैसियत की छांव में…….
बड़े शहर की जिंदगी…
Comments
8 responses to “बड़े शहर की जिंदगी…”
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शहरीकरण और ग्रामीण जीवन में अंतर ,सोंच में अंतर बखूबी बयां किया है प्रतीमाजी ।
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बहुत बहुत धन्यवाद 🙏
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तुलनात्मकता के साथ बड़ी सहजता से आपने भाव रखें हैं और अपनी श्रेष्ठ काव्य प्रतिभा का प्रदर्शन किया है
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इतनी सुंदर समीक्षा व मेरे काव्य का सम्मान करने के लिए हार्दिक धन्यवाद आपका प्रज्ञा जी
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अतिसुंदर
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Thank you sir
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शहरीजीवन और ग्रामीण जीवन अद्भुत सच्चाई
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बहुत-बहुत धन्यवाद भाई मेरी रचनाओं को अपना कीमती समय देने के लिए
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