खलिश जितनी भी है
सारी उड़ेलूं सोचता है मन,
मगर प्रसन्नता की राह तो
यह भी नहीं पक्की।
चलो छोड़ो भी जाने दो
न आये नींद आंखों में
मगर कुछ चैन पाने को
जरूरी है जरा झपकी।
खलिश जितनी भी है
Comments
16 responses to “खलिश जितनी भी है”
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गजब, सुन्दर
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धन्यवाद जी
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सुन्दर
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सादर धन्यवाद जी
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बहुत सुन्दर
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बहुत धन्यवाद जी
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सुन्दर पंक्तियां
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सादर धन्यवाद जी
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सुंदर
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बहुत बहुत धन्यवाद, सादर नमस्कार
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काबिल- ए-तारीफ़
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सादर धन्यवाद जी
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वाह
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Thank you ji
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काबिले तारीफ है सर..
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बहुत सारा धन्यवाद जी
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