अभी-अभी।

अभी-अभी कुछ बूंदों से रूबरू हुए,
चमकते हैं मोती से,
बरसते हैं बुंदों की तरह।
पर आयानास ही नहीं बरसते।
जब बनते हैं गम के बादल,
सिमट जाते हैं पलकों पर।
फिर गिरते हैं धीरे-धीरे
बिना किसी शोर के क्षण-क्षण।

Comments

12 responses to “अभी-अभी।”

  1. बहुत ही सुन्दर

    1. बहुत बहुत आभार सुमन जी

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर

    1. हार्दिक धन्यवाद सर

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