मालिक

मालिक मेरे ततू मुझे शरण दे
बहुत थक चुका हू मै
अब ना ढोया जाए
ये बैरी दुनिया

लब पर आए ना कोई नाम
बस तू ही तू है हर शाम
लोग मीठे बस स्वार्थ से
हम जुड़े बस परमार्थ से

कौन अपने कौन पराए
समझ ना पाउँ
मन की यह पीरा कोई नहीं समझा
इस चमक धमक मे रोज़ नया चेहरा

स्वार्थ की दुनिया मे बस तू ही अपना
लड़ पछताऊ किस को बताऊ यह क्लेश
ए परम पिता त्वम् शरणनम
मुक्त कर इस माया से जन्म

Comments

6 responses to “मालिक”

  1. अतिसुन्दर

  2. Geeta kumari

    सुन्दर अभिव्यक्ति

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