गैंग रेप**

बारी-बारी लूटा मुझको
बारी-बारी रौंदा
नारी होने पर बेबस थी
खत्म हो गया जीवन का औधा
ना..री…ना रो
एक दिन मिलेगा तुझको
इन्साफ सबने यही
समझाया
जब कोर्ट में सवालों ने किया शर्मिंदा
कुछ भी ना समझ आया
इतना लज्जित ना हुई थी तब
जब यह कुकृत्य हुआ था
जैसा लगा है वकीलों के सवाल से
ऐसा कभी ना लगा था
मैं पछताई जो सोंचा मैंने
इन्साफ मुझे मिल पाएगा
पुरुष प्रधान देश में ऐसा
कुछ भी ना संभव हो पाएगा
गैंग रेप से पीड़ित होकर
इन्साफ की आस में जिन्दा थी
कोर्ट में सबके सवालों के आगे
बेबस थी शर्मिंदा थी..

Comments

9 responses to “गैंग रेप**”

  1. Geeta kumari

    बहुत ही मार्मिक और दुःख भरी प्रस्तुति ।

  2. Satish Pandey

    सोचने पर मजबूर करती बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति। लेखनी में दर्द भरा है। भाव की गंभीरता को सैल्यूट

  3. Shyam Kunvar Bharti

    बेहद गंभीर भाव

  4. दुखभरी दास्तानों को सुनकर अब कान भी हो रहे घायल। विनयचंद आखिर कब तक गुमसुम रहेगी पायल।।

  5. Pratima chaudhary

    बहुत ही मार्मिक, यथार्थपरक रचना

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