मुक्तक

मैं अभिमन्यु
मां के पेट में ही मज़दूरी के गुर
सीख चुका था;
किंतु निकल नहीं पाया इस
चक्रव्यूह से-
इसी से पीढ़ी दर पीढ़ी
मज़दूरी की विरासत बांट रहा हूं !

Comments

4 responses to “मुक्तक”

  1. वाह वाह बहुत खूब, सादर नमस्कार

  2. वाह! बहुत उम्दा पंक्तियां

  3. Geeta kumari

    वाह, सुंदर अभव्यक्ति

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