फूला पलाश

झूमते पात फागुनी बयार में झूमते गात वासंती तानी खेतों पर चादर फूली सरसों दहके वन केसरिया वितान फूला पलाश महके वन महुआ से, अंबुआ…

गीली रेत पर…..

थमी हुई जिंदगी थमे हुए पल रुकती, चुकती सांसें उंगलियों की पोरों से छूटते रिश्तों के रेशमी धागे ठंडी, बेजान दीवारों से टकराते जीने, मरने,…

मुक्तक

मैं अभिमन्यु मां के पेट में ही मज़दूरी के गुर सीख चुका था; किंतु निकल नहीं पाया इस चक्रव्यूह से- इसी से पीढ़ी दर पीढ़ी…

मुक्तक

लकड़ी जली, कोयला हुई कोयला जले, राख रही अग्नि परीक्षा सीता की हुई राम जी की साख रही १७.०५.२०२०

इंतज़ार

इंतज़ार झिलमिलाता रहा रातभर आंखों में! तुम नहीं तुम्हारा पैग़ाम आया ‘आज न सही, कल की बात रही’। चलो मान लेते हैं; एक और झूठ…

घर

‘यह कैसा घर है! कि- जिस में एक भी झरोखा नहीं’ दहलीज़ पर खड़ी हवा बोली। सुनो कुछ देर को मुझे अंदर आने दो- यहां…

क्षणिकाएं

1. कदम छोटा हे या बड़ा हर मोड़ पर इंतज़ार है ज़िंदगी को – चुन लिए जाने का 2. राम लिखा सुनहरा इतिहास ने तुम्हारा…

साझा दुःख

माई री हम दोनों का दुःख साझा है.। तू कुम्हलाई तू मुरझाई ््अंग-अंग तेरे पड़ी बिवाई ्अंबर हारा दस दिश हारे सूख गया आंखों का…

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