Anu Somayajula's Posts

फूला पलाश

झूमते पात फागुनी बयार में झूमते गात वासंती तानी खेतों पर चादर फूली सरसों दहके वन केसरिया वितान फूला पलाश महके वन महुआ से, अंबुआ से उपवन प्रीत के रंग भीगी गूजरिया रे पिया के संग १८.०३.२०२१ »

गीली रेत पर…..

थमी हुई जिंदगी थमे हुए पल रुकती, चुकती सांसें उंगलियों की पोरों से छूटते रिश्तों के रेशमी धागे ठंडी, बेजान दीवारों से टकराते जीने, मरने, हंसने और रोने के पल कितना कुछ लिख गया गुज़रता साल गीली रेत पर कोई तो मौज हो मिटा जाए इस अनचाही तहरीर के निशान छू जाए आते साल का पहला क़दम कि ज़िंदगी बेख़ौफ फिसल आए बेजान दीवारों से फिर लिख जाए अपना नाम गीली रेत पर डॉ. अनू ३१.१२.२०२० »

मुक्तक

मैं अभिमन्यु मां के पेट में ही मज़दूरी के गुर सीख चुका था; किंतु निकल नहीं पाया इस चक्रव्यूह से- इसी से पीढ़ी दर पीढ़ी मज़दूरी की विरासत बांट रहा हूं ! »

मुक्तक

लकड़ी जली, कोयला हुई कोयला जला, राख रही अग्नि परीक्षा सीता की राम जी की साख रही २७.०९.२०२० »

मुक्तक

लकड़ी जली, कोयला हुई कोयला जले, राख रही अग्नि परीक्षा सीता की हुई राम जी की साख रही १७.०५.२०२० »

इंतज़ार

इंतज़ार झिलमिलाता रहा रातभर आंखों में! तुम नहीं तुम्हारा पैग़ाम आया ‘आज न सही, कल की बात रही’। चलो मान लेते हैं; एक और झूठ तुम्हारे नाम पर जी लेते हैं »

घर

‘यह कैसा घर है! कि- जिस में एक भी झरोखा नहीं’ दहलीज़ पर खड़ी हवा बोली। सुनो कुछ देर को मुझे अंदर आने दो- यहां बाहर बड़ी घुटन है। »

राह भूल सी गई है हमको

राह भूल सी गई है हमको जो छोड़ आओ, तो बात बने मंज़िल की सरहद पर दीया जो छोड़ आओ, तो बात बने मेरी तेरी या उसकी बातें जो छोड़ आओ, तो बात बने ढाई आखर हर देहरी पर जो छोड़ आओ,तो बात बने »

क्षणिकाएं

1. कदम छोटा हे या बड़ा हर मोड़ पर इंतज़ार है ज़िंदगी को – चुन लिए जाने का 2. राम लिखा सुनहरा इतिहास ने तुम्हारा नाम ; तुमने – गढ़ ली सीता सोने की ! ( तज दी सीता सोने सी !!! ) »

क्षणिकाएं

1. पहली ही सीढ़ी पर एहसास हुआ, सर पर खुला आसमां हो भले ही अब – पैर तले ज़मीन नहीं 2. चाहे-अनचाहे उग आए हैं संबंधों में अपरिचय के विंध्याचल ; हम भी जो पा लेते थोड़ा सा अगस्त्य का बौनापन !!! »

सुनते आए हैं…..

सुनते आए हैं – अपनों का पर्व है होली मेरे आंगन जली होलिका मैं ही पंडित, मैं ही पूजा मैं ही कुंकुम, अक्षत औ” रॊली; सूनी गलियां, सूने गलियारे, सूने हैं आंगन सारे कौन संग मैं खेलूं होली! सुनते आए हैं – रंगों का पर्व है होली सुबह गुलाबी नहीं रही, अब सांझ नहीं सिंदूरी, धरती से रूठी हरियाली बेरंगा है अंबर भी; रंगों की थाल सजी, पर कौन रंग से खेलूं होली! सुनते आए हैं – खुशियों का पर्व है... »

साझा दुःख

माई री हम दोनों का दुःख साझा है.। तू कुम्हलाई तू मुरझाई ््अंग-अंग तेरे पड़ी बिवाई ्अंबर हारा दस दिश हारे सूख गया आंखों का पानी तू ही बतला तुझ पर रोऊं या बाबा की निर्जीव देह पर माई री हम दोनों का दुःख साझा है हर नव कोंपल में उस की सूरत हर डाली उसका ही कांधा है माई री बाबा का यह सच हम दोनों का ही साझा है हम दोनों का दुःख साझा है »