अब के झमाझम सावन ने ताना अंतरपट झीना, झिलमिल – झिलमिल अंबर से धरती तक ढोल – नगाड़े बजते अविरत बिजली का मंडोला सजता नभ में बूंदों का सेहरा बांधे उतरा बादल धानी धरती का […]

अब के झमाझम सावन ने ताना अंतरपट झीना, झिलमिल – झिलमिल अंबर से धरती तक ढोल – नगाड़े बजते अविरत बिजली का मंडोला सजता नभ में बूंदों का सेहरा बांधे उतरा है बादल धानी धरती […]

बचपन में पूछा करते जब भी दादी से दादी साड़ी श्र्वेत क्यों सर पर काले केश नहीं क्यों दादी कहतीं ‘ रंग गए सब दादा के संग वेणी, जूड़ा, काजल, बिंदी, केश गए दादा के […]

झूमते पात फागुनी बयार में झूमते गात वासंती तानी खेतों पर चादर फूली सरसों दहके वन केसरिया वितान फूला पलाश महके वन महुआ से, अंबुआ से उपवन प्रीत के रंग भीगी गूजरिया रे पिया के […]

थमी हुई जिंदगी थमे हुए पल रुकती, चुकती सांसें उंगलियों की पोरों से छूटते रिश्तों के रेशमी धागे ठंडी, बेजान दीवारों से टकराते जीने, मरने, हंसने और रोने के पल कितना कुछ लिख गया गुज़रता […]

मैं अभिमन्यु मां के पेट में ही मज़दूरी के गुर सीख चुका था; किंतु निकल नहीं पाया इस चक्रव्यूह से- इसी से पीढ़ी दर पीढ़ी मज़दूरी की विरासत बांट रहा हूं !

‘यह कैसा घर है! कि- जिस में एक भी झरोखा नहीं’ दहलीज़ पर खड़ी हवा बोली। सुनो कुछ देर को मुझे अंदर आने दो- यहां बाहर बड़ी घुटन है।

राह भूल सी गई है हमको जो छोड़ आओ, तो बात बने मंज़िल की सरहद पर दीया जो छोड़ आओ, तो बात बने मेरी तेरी या उसकी बातें जो छोड़ आओ, तो बात बने ढाई […]

1. पहली ही सीढ़ी पर एहसास हुआ, सर पर खुला आसमां हो भले ही अब – पैर तले ज़मीन नहीं 2. चाहे-अनचाहे उग आए हैं संबंधों में अपरिचय के विंध्याचल ; हम भी जो पा […]

सुनते आए हैं – अपनों का पर्व है होली मेरे आंगन जली होलिका मैं ही पंडित, मैं ही पूजा मैं ही कुंकुम, अक्षत औ” रॊली; सूनी गलियां, सूने गलियारे, सूने हैं आंगन सारे कौन संग […]

माई री हम दोनों का दुःख साझा है.। तू कुम्हलाई तू मुरझाई ््अंग-अंग तेरे पड़ी बिवाई ्अंबर हारा दस दिश हारे सूख गया आंखों का पानी तू ही बतला तुझ पर रोऊं या बाबा की […]