जरा सा गौर से देखो

तुम्हारे हाथ में अपनत्व की
जो कुछ लकीरें हैं
उन्हीं में एक मैं भी हूँ
जरा सा गौर से देखो।
आईना सामने रख
खुद की नजरों में जरा देखो,
मिलूंगा नीलिमा में तुम
जरा सा गौर से देखो।
कहीं राहों में जब मुश्किल
खड़ी हो सामने कोई,
मिलूंगा साथ देता तुम
जरा सा गौर से देखो।
हर खुशी हो तुम्हारी बस
मुझे इतनी ही अभिलाषा
मित्र हूँ एक अदना सा
जरा सा गौर से देखो।

Comments

5 responses to “जरा सा गौर से देखो”

  1. बहुत ही बढ़िया, जबरदस्त कविता सर, वाह

  2. Suraj Tiwari

    बहुत खूब चाचा जी

  3. Vasundra singh Avatar

    वाह बहुत बढ़िया

  4. बहुत सुंदर सर, मित्रता पर कमाल लिखा है आपने

  5. Geeta kumari

    दोस्ती पर बहुत ही शानदार कविता लिखी है सर। “कहीं राहों में जब मुश्किल खड़ी हो सामने कोई, मिलूंगा साथ देता तुम, ज़रा सा गौर से देखो ” दोस्त का साथ देने की खूबसूरत भावनाओ को बहुत ही खूबसूरती से दर्शाया है ।आपकी लेखनी से बहुत ही सुन्दर साहित्य निकला है ।लेखनी को अभिवादन ।

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