14 Comments

  1. प्रकृति प्रेम की बहुत सुंदर कविता। वास्तव में मनुष्य ने प्रकृति का अनियंत्रित दोहन कर प्रकृति को रुष्ठ किया है। आपने सच्ची और यथार्थ प्रस्तुति दी है गीता जी।
    हे मनुज तेरी ही हानि हो रही,
    लगा लगाम लालच पर अपने।
    इन पंक्तियों में उपस्थित अनुप्रासिक छटा काव्यगत शिल्प में चार चांद लगा रही है, वाह।

    1. आपकी बेहतरीन समीक्षा से मन प्रसन्न हो गया है सतीश जी । कविता के शिल्प की इतनी सुंदर व्याख्या की है , ये मेरे लेखन के लिए बहुत ही उत्साह वर्धक और प्रेरक है । बहुत बहुत धन्यवाद सर🙏

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