वन-सम्पदा

वृक्षों को काट-काट कर,
इति करे सब वन
प्रकृति का सर्वनाश किया है,
कमाने को केवल कुछ धन।
दोहन कर-कर प्रकृति का भी,
चैन मनुज को ना आया
पशु , पक्षियों को बेघर किया है,
लालच वृद्धि करता प्रति क्षण।
प्रतिकार प्रकृति भी लेती है ,
फ़िर शुद्ध पवन कम देती है
फ़िर भी मानव को चैन नहीं,
काट रहा है फिर भी वन
हे मनुज तेरी ही हानि हो रही,
लगा लगाम लालच पर अपने
अब भी करदे ये सब बंद ,
अब भी करदे ये सब बंद ।।

*****✍️गीता*****

Comments

14 responses to “वन-सम्पदा”

  1. वाह वाह, प्रकृति पर बहुत ही उम्दा रचना

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद सर , सादर आभार 🙏

  2. अति सुंदर

    1. Geeta kumari

      Thank you Rishi ji

  3. Satish Pandey

    प्रकृति प्रेम की बहुत सुंदर कविता। वास्तव में मनुष्य ने प्रकृति का अनियंत्रित दोहन कर प्रकृति को रुष्ठ किया है। आपने सच्ची और यथार्थ प्रस्तुति दी है गीता जी।
    हे मनुज तेरी ही हानि हो रही,
    लगा लगाम लालच पर अपने।
    इन पंक्तियों में उपस्थित अनुप्रासिक छटा काव्यगत शिल्प में चार चांद लगा रही है, वाह।

    1. Geeta kumari

      आपकी बेहतरीन समीक्षा से मन प्रसन्न हो गया है सतीश जी । कविता के शिल्प की इतनी सुंदर व्याख्या की है , ये मेरे लेखन के लिए बहुत ही उत्साह वर्धक और प्रेरक है । बहुत बहुत धन्यवाद सर🙏

  4. बहुत खूब प्रकृति प्रेम की सुंदर रचना

    1. Geeta kumari

      Thanks Allot Piyush ji.

  5. वाह बहुत खूब

    1. Geeta kumari

      आपका बहुत शुक्रिया जोशी जी🙏

  6. Vasundra singh Avatar
    Vasundra singh

    सुंदर काव्य रचना

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद वसुंधरा जी

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद आपका भाई जी 🙏 सादर आभार

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