जब मुसीबत आई तो मैंने ये नहीं सोंचा
कि ‘अब कौन काम आएगा’
बल्कि यह सोंचा कि देखती हूँ
अब कौन साथ छोंड़ जाएगा..
मुसीबत आई
Comments
8 responses to “मुसीबत आई”
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बहुत खूब, सुन्दर अभिव्यक्ति
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Thanks
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कवि प्रज्ञा जी की कविता में बहुत ही गहराई और सच्चाई छिपी हुई है
मुसीबत में कोई साथ छोड़ दे तो कैसा अपनापन ।
वाह ,बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ।-

धन्यवाद दी
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Tq
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बहुत खूब
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Dhanyawaaad
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