बेवजह मत उछालो
इस तरह से कीच दूजे पर,
जिंदगी मत बिताओ
दूसरों से रोज लड़-भिड़ कर।
प्यार से भी कभी जी लो
करो इज्जत सभी की तुम,
स्वयं ही दूर भागेंगे
न टिक पायेंगे कोई गम।
हर घड़ी लाभ मत देखो
कहीं पर स्वार्थ भी छोड़ो
तोड़ने से तो अच्छा है
मोहब्बत की कड़ी जोड़ों।
मोहब्बत की कड़ी जोड़ों
Comments
8 responses to “मोहब्बत की कड़ी जोड़ों”
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टाइपिंग मिस्टेक
शीर्षक में “जोड़ों” के स्थान पर जोड़ो” आयेगा। कुछ इस तरह
मोहब्बत की कड़ी जोड़ो -

वाह वाह very nice lines sir
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बहुत ही खूबसूरत, वाह क्या बात है
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“दूसरों से रोज लड़-भिड़ कर।प्यार से भी कभी जी लोकरो इज्जत सभी की तुम,स्वयं ही दूर भागेंगे न टिक पायेंगे कोई गम।”
कवि सतीश जी की बहुत सुन्दर काव्य रचना,जिसमे उन्होंने लड़ाई झगड़े से दूर रह कर प्रेम से रहने का संदेश दिया है । स्वार्थ परकता को छोड़ कर प्रेम मोहब्बत से जीने का संदेश देती हुई बहुत ही शानदार रचना । सुंदर प्रस्तुतिकरण ।बेहतरीन लेखनी की बेहतरीन अभिव्यक्ति ।-
इतनी खूबसूरत समीक्षा हेतु धन्यवाद शब्द भी कम है। गीता जी आपके द्वारा की गई यह समीक्षा उत्साहवर्धक और प्रेरणादायी है। सादर धन्यवाद
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बहुत खूब, उम्दा
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अतिसुंदर भाव
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हर घड़ी लाभ मत देखो
कहीं पर स्वार्थ भी छोड़ो
दौड़ने से तो अच्छा है
कही मोहब्बत की कड़ी जोड़ो|
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सर आपने एक ऐसी सच्चाई बयां की जिसकी जरूरत थी,
कम शब्दों में उच्च कोटि की रचना
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