ओ कवि, जरा सम्भल कर लिखना
यह कविता नही परछाई है तेरी
आत्मा का प्रतिरूप यह
तेरे अन्दर छिपी भावनाओं की प्रतीक है
अच्छे या बुरे उजागर हो जाओगे
फिर दुराव- छिपाव ना रख पाओगे
एक खुली किताब कहलाओगे
उजागर अपनी हर पीड़ा कर जाओगे
कलम तुम्हारा दृषिटकोण समझा जाएगी
तुम्हारा हर अनुभव जग-जाहिर कर जाएगी
फिर रहोगे ना खुद के ,बेपरदा हो जाओगे
दर्पण सा ही अनुभव कर पाओगे ।
कवि
Comments
6 responses to “कवि”
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बहुत ही विचारणीय रचना
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शुक्रिया
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बहुत खूब
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धन्यवाद जी
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सुन्दर रचना
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शुक्रिया जी
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