गम मिटाना तुम

रखना लगाव खोलकर के द्वार दिल के तुम।
जितना वो दे उससे भी अधिक प्यार देना तुम।
कभी किसी दुखी का दर्द मत बढ़ाना तुम,
जरा सा नेह देना और गम मिटाना तुम।
चूमो शिखर मगर नजर जमीन पर रहे,
जिस भूमि पर खड़े हो उसे मत भुलाना तुम।
कोई पसंद गर न हो तो छोड़ दो उसे,
जबरन पसंद थोप कर के मत रुलाना तुम।

Comments

5 responses to “गम मिटाना तुम”

  1. वाह सर, बेहतरीन गजल

  2. वाह पाण्डेय जी बहुत खूब

  3. Geeta kumari

    अति सुंदर भाव और अति सुन्दर प्रस्तुति.”कभी किसी दुखी का दर्द मत बढ़ाना तुम,जरा सा नेह देना और गम मिटाना तुम।”….. बहुत ही खूबसूरत लयबद्ध ग़ज़ल.

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