कविता- मेरा मित्र
———————–
मेरा मित्र-
कमी बताया करता है,
जब भी मिला हूं उससे,
पढ़ कर मेरे चेहरे को,
हकीकत बताया करता है|
मेरी गलती –
खुद न समझ सका,
दे न सका धोखा ओ,
जो था वही दिखा सका,
उसे सच दिखाने की बिमारी है
सख्त पहरेदार मेरा,
गुनाह करने से डरता हूं,
चेहरा कैसे दिखाऊंगा,
सत्य हठी निष्पक्ष मित्र मेरा,
डरता नहीं, सत्य ही दिखाएगा|
साफ़ रहो, बेदाग बनों,
स्वच्छ छवि, इंसान बनों,
सुबह सुबह दर्पण से डरना सीखों,
चरित्रहीन ना ,चरित्रवान बनो
माना बेशर्म बनकर,
जीवन गुजारोंगे,
डरो यार वजूद से,
खुदा को कैसे शक्ल दिखाओगे|
—————————————
**✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”——
मेरा मित्र
Comments
11 responses to “मेरा मित्र”
-

NICE
-
❤tq
-
-
वाह, ऋषि निखार आता जा रहा है। आपने सच्चे मित्र को मूर्त रूप में प्रस्तुत किया है। बहुत खूब
-
आपका साथ रहा हर कमी दुर हो जायेगा ❤❤tq
-
-

अतिसुन्दर
-
Tq
-
-
वाह ऋषि जी, एक भी त्रुटि नहीं है । जबरदस्त निखार है । वैरी गुड
मित्र पर बहुत सुंदर कविता-
छात्र हूं सीख लूंगा आप सब से ही
और मेरा हक
❤❤tq 🙏
-
-

बहुत खूब अतीव सुंदर, यथार्थ रचना
-
🙂❤tq
-
-
अतिसुंदर
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.