काम ही काम

घर के काम
बाहर के काम
काम की तो जैसे
बारिश हो रही है
सुकून के कुछ पल मिल जाएं
हम भी कुछ हंसें, बोलें
ऐसी ख्वाहिश हो रही है

*****✍️गीता

Comments

8 responses to “काम ही काम”

  1. वाह, बहुत सुन्दर रचना

    1. Geeta kumari

      बहुत सारा धन्यवाद कमला जी 🙏

  2. बहुत ही लाजवाब रचना, काम के बोझ तले दबे इंसान की सुकून की तलाश की संवेदना कवि की कलम से मुखरित हुई है। वाह

  3. Geeta kumari

    इस सुंदर समीक्षा हेतु आपका बहुत बहुत धन्यवाद आपका सतीश जी. कविता के भाव की बखूबी व्याख्या की है आपने .अभिवादन सर 🙏

  4. वाह!
    ख्वाहिशें कहाँ पूरी होती हैं
    ये तो हरगिज अधूरी होती हैं

    1. सुन्दर समीक्षा हेतु हार्दिक धन्यवाद प्रज्ञा जी

    1. बहुत। बहुत शुक्रिया आपका भाई जी 🙏

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