अब के दशहरे

चलो ! अब के दशहरे ,
नया कोई चलन करते हैं।
भला कब तक जलाते रहें,
लकड़ी का रावण,
मन में जो बैठा है,
उसी का आज दहन करते हैं,
चलो अब के दशहरे !
नया कोई चलन करते हैं।

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