अब के दशहरे

चलो ! अब के दशहरे ,
नया कोई चलन करते हैं।
भला कब तक जलाते रहें,
लकड़ी का रावण,
मन में जो बैठा है,
उसी का आज दहन करते हैं,
चलो अब के दशहरे !
नया कोई चलन करते हैं।

Comments

7 responses to “अब के दशहरे”

  1. Geeta kumari

    अति सुन्दर भाव एवम् प्रस्तुति

  2. सुन्दर अभिव्यक्ति

  3. Praduman Amit

    बहुत ही सुन्दर भाव है।

  4. बिलकुल सही सोच ।
    सुन्दर अभिव्यक्ति

  5. मोहन सिंह मानुष Avatar

    आप सभी का हार्दिक धन्यवाद 🙏 🙏

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