अकेले रह जाते हैं

सुंदरता के आकर्षण में बंध
कोई इतना कैसे भा जाता है
ईश्वर से मांग को हो धन्यवाद
प्रार्थना से जीवन में लाता है

पाकर इच्छित साथी खूब इतराता है
अपनों को ठुकरा उसे अपना बनाता है
नये रिश्ते जुड़ते ्संबंध छूट से जाते हैं
उमंग में लेकिन महसूस कहां कर पाते हैं

जीवन पाते खोते आगे बढ़ता जाता है
सुख दुख का आना जाना लगा रहता है
इक दूसरे के आशाओं को समझते हुए
जिंदगी भी इक समझौता सा लगता है

शौक सभी ने पाले थे जो जो
धाराशाई होते चले जाते हैं
कयी हसरतों से पालते बच्चों को
सपने हमेशा टूटते चले जाते हैं

खून के रिश्ते होते हैं मजबूत
क्यूं अचानक बिखर से जाते हैं
पर की चाहत रखने के लिए
जननी के आंसू नजर न आते हैं

माता स्वाभिमान को भूल कैसे भी
बच्चों के लिए निज को भुलाती है
संतान की निष्ठुरता को सहकर भी
स्व को बलिदान किये चली जाती है

बचपन से सब रटते पढ़ते कि
इतिहास स्वयं को दुहराता है
भविष्य का फिर भी न डर इनको
इंसान सदा किया हुआ पाता है

भेद परिवार में जो पैदा करते रहते
स्वयं सुखों का हमेशा संधान किया
ऐसी बहुत बेटियां ने स्वयं ही तो
अपने जीवन को श्मशान किया

अपना पेट काट काट कर जो
अपने अनुजों को पालते हैं
उनमें सुधार न पाकर अग्रज
मन ही मन चिन्तित हुए जाते हैं

भाई को तिजोरी मानकर जो
उसकी खुशियों को खा जाते हैं
इक दिन तो करनी का फल मिलता
फिर हाथ मलते हुए पछताते हैं

मांगने को ही जो निज रिश्तों में
अपना ईमान बनाते चले जाते हैं
खुद को ही धोखा देते रहते
दुनियां में अकेले रह जाते हैं

Comments

5 responses to “अकेले रह जाते हैं”

  1. Geeta kumari

    पूरे परिवार के रिश्तों पर बहुत सुंदर रचना एवम् सुंदर प्रस्तुति

  2. बहुत खूब सुन्दर अभिव्यक्ति

  3. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

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