धून्ध है चारों तरफ़

धून्ध है चारों तरफ़
रास्ते की खबर नहीं
जाऊँ तो जाऊँ कहाँ
आती मंजिल नज़र नहीं ।
फिक्र अब कहाँ
ये जहाँ मिलें
निन्द है कहाँ
जो स्वप्न नया खिले
बढ सकूँ जहाँ
कोई ऐसी डगर नहीं
जाऊँ तो जाऊँ कहाँ
आती मंजिल नज़र नहीं ।
कैसे धीर मैं धरूँ
ख़्वाहिश चूङ ऐसे हुयी
शीशे के गिरने से
बिखर के रह गयी
अपना किसी कहें
किसी पे दर्द का असर नहीं
जाऊँ तो जाऊँ कहाँ
आती मंजिल नज़र नहीं ।

Comments

7 responses to “धून्ध है चारों तरफ़”

  1. Geeta kumari

    ह्रदय स्पर्शी रचना

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद

  2. Rajeev Ranjan Avatar

    जाने की सोचना ही करता जब दिवाली आने को हो
    अंधेरे की उम्र अब खत्म
    उजाला चहुंओर जाने को हो
    राहें कहां कभी भी बंद होती है
    कुछ कदम हिम्मत करें तो
    सौ नयी राह खुलती है

    1. Rajeev Ranjan Avatar

      करता की जगह क्या
      और जाने की जगह छाने होगा
      सुमनजी बहुत सुंदर लिखा आपने

    2. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद

  3. Suman Kumari

    सादर आभार

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