8 Comments

  1. हम भी कुछ कहना चाहते थे,
    बोल ही ना निकले मुख से
    कह ही पाए ना कुछ भी,
    हया से सिमट के हम
    मंद-मंद मुस्काने लगे,
    बहुत ही लाजवाब पंक्तियाँ हैं। कवि गीता जी की लेखनी से निकली बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ हैं यह। यह निरंतरता बनी रहे।

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