नील-परिधान

नील परिधान में जब,
सम्मुख उनके आ गई
उनको देख कर,
मेरी भी नज़र शरमा गई
देख कर हमें वो,
कुछ गुनगुनाने लगे
हम भी कुछ कहना चाहते थे,
बोल ही ना निकले मुख से
कह ही पाए ना कुछ भी,
हया से सिमट के हम
मंद-मंद मुस्काने लगे

*****✍️गीता

Comments

8 responses to “नील-परिधान”

  1. बहुत सुंदर पंक्तियां वाब वाह !

    1. बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी

  2. Satish Pandey

    हम भी कुछ कहना चाहते थे,
    बोल ही ना निकले मुख से
    कह ही पाए ना कुछ भी,
    हया से सिमट के हम
    मंद-मंद मुस्काने लगे,
    बहुत ही लाजवाब पंक्तियाँ हैं। कवि गीता जी की लेखनी से निकली बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ हैं यह। यह निरंतरता बनी रहे।

    1. Geeta kumari

      आपकी प्रेरक और सुन्दर समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी

  3. SANDEEP KALA BANGOTHARI

    बहुत ही अच्छा

    1. Geeta kumari

      सादर धन्यवाद

    1. Geeta kumari

      सादर धन्यवाद भाई जी 🙏

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