जब मां की कोख में
मेरी जिंदगी पल रही थी
मेरे बाप की चिता भी
श्मशान में जल रही थी
जब हमने इस दुनिया में
अपनी आंखें खोली
देखी खून की होली
सुनी बंदूकों की गोली
चारों तरफ बनता गया
बस मौत का ही नक्शा
सुहागन तो सुहागन
विधवा को भी ना बक्शा
मैंने जब धरती पर
कदम रखकर चलना सीखा
बदले की आग में साथ ही
हमने जलना सीखा
उठा ली बंदूक हमने
किया मौत को हिरासत
क्योंकि मेरे अपनो से मिली थी
यह दौलत हमें विरासत।
वीरेंद्र सेन प्रयागराज
विरासत
Comments
3 responses to “विरासत”
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अतिसुंदर भाव
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आभार
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बहुत खूब, सुन्दर अभिव्यक्ति
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