बदल पाते

दिन अगर बदल सकते
पुनः अपने बचपन में लौट पाते ।
फिर से पापा की नन्हीं परी बन
चार पैसे की नेमचुस खरीद लाते।
घर की चौखट पे बैठे,
बाट देखती चाचू की,
पटाखो के संग घरकुल्ला खरीद लाते।
धान के नेवारी तले, पिल्ले को रख
गभी उसकी भूख की चिंता
कभी ठंढ से बचाने का डर
भैया के संग मन से निकाल आते।
ना अपनों के
दूर जाने की फिक्र
मिले फिर वो लम्हा
जो हो दुनिया से इतर
पुनः विश्वास की ज्योत जगा पाते ।
अपनों का बदलना है भाता कहाँ
कुछ भी हो, वो हमसे दूर जाता कहाँ
कङवाहटे जिसने यह है घोली
दोष उसका नहीं जो बनती है भोली
यह टीस मिटा पाते कहाँ ।

Comments

10 responses to “बदल पाते”

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद

  1. Geeta kumari

    अति सुन्दर रचना

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद

  2. Virendra sen Avatar

    सुंदर अभिव्यक्ति

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद धन्यवाद

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद

  3. काश !!!
    बहुत लाजवाब

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद

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