मस्तमौला चाल मेरी
मैं पुहुप हूँ गांव का
आ गया तेरे शहर
कंटक समझ मत पांव का।
घूमता बेघर फिरा हूँ
है मनोरथ छांव का
जिंदगी वारिधि सरीखी
क्या भरोसा नाव का।
मैं पुहुप हूँ गांव का
Comments
12 responses to “मैं पुहुप हूँ गांव का”
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Very nice lines
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Thank you
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बहुत खूब
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Dhanyawad
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Wah bhut khub
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Thanks
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अतिसुंदर भाव
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सादर धन्यवाद
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बहुत खूब
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बहुत बहुत धन्यवाद
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बहुत उम्दा व रोचक
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Dhanyawad
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