अन्यथा तम है अभी भी (गीतिका छंद में)

अब सवेरा हो गया है,
कब मुझे लगने लगे।
अस्त सारा तम हुआ है
कब मुझे लगने लगे।
उग रही कोपल खुशी की
दृगजल अब सुखना है,
दूर मन का गम हुआ है
कब मुझे लगने लगे।
उठ रहे हैं प्रश्न मन में
पूछते है बात खुद
आस अब नूतन जगेगी
कब मुझे लगने लगे।
देश का यौवन चला है
मार्ग पर उन्नति के अब
कुछ उसे मौका मिला है
जब तुझे लगने लगे।
तब समझ जाना कि सचमुच
में सवेरा हो गया,
अन्यथा तम है अभी भी
बस दिखावा हो गया ।
पौध मुरझा सी रही है,
क्या करें प्रातः से हम,
देख, यौवन की हताशा,
हो नहीं पाई है कम।
इस तरह सब कुछ सही है
किस तरह लगने लगे,
जब नई कोपल हमारी
हूँ व्यथित कहने लगे।
****** गीतिका मात्रिक छंदबद्ध पंक्तियाँ
—- डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय

Comments

12 responses to “अन्यथा तम है अभी भी (गीतिका छंद में)”

  1. Very very nice poem, true lines

    1. Satish Pandey

      Thanks

  2. harish pandey

    Wah bhut khub

    1. Satish Pandey

      Thank you

  3. Geeta kumari

    युवा वर्ग की उन्नति के संदर्भ में विचार करती हुई बहुत सुंदर और उत्साह वर्धक रचना

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

  4. प्रेरक रचना

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद

  5. Saurav Tiwari

    Ati sundar

    1. Satish Pandey

      बहुत धन्यवाद

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