तेरी परछाई को देख लेता हूँ
चेहरे को देखने का मौका कहाँ मिलता।
ज़िन्दगी के इस खेल में
दौड़-दौड़ दौड़ लेता हूँ चौका कहाँ मिलता।।
ज़िन्दगी के इस खेल में
Comments
6 responses to “ज़िन्दगी के इस खेल में”
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बहुत बहुत शानदार लिखा है शास्त्री जी, वाह वाह
तेरी परछाई को देख लेता हूँ
चेहरे को देखने का मौका कहाँ ,
काबिलेतारीफ पंक्तियाँ-
बहुत बहुत धन्यवाद पाण्डेयजी
अगली पंक्ति पर भी गौर फरमाईए
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Bahut shaandaaar
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धन्यवाद
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बहुत खूब भाई जी लाजवाब अभिव्यक्ति
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अतिसुंदर
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