गीत जिन पर लिखे वे पुराने हुए
उनको देखे बिना भी जमाने हुए,
अब सफर में जुड़े मित्र हैं सब नए
वो पुराने न जाने कहाँ गुम हुए।
बीतते रह गए दिन रही आस बस
फिर मिलेंगे कहा, पर मिले ही नहीं
भीड़ में खोजता ही रहा मन मुआ,
खो गये वे पुराने मिले ही नहीं।
बात जैसी थी पहले रही अब न वो
चाह जैसी थी पहले रही अब न वो।
गीत के बोल भी वो रहे अब नहीं,
खो गए दिन सुरीले क्षितिज में कहीं।
तब की बातें अलग थी अलग आज हैं,
तब समय भी अलग था, अलग आज है,
जो भी अंतर रहा अब व तब में भले,
तब के मित्रों का दिल में रहा राज है।
उनको देखे बिना भी जमाने हुए
Comments
6 responses to “उनको देखे बिना भी जमाने हुए”
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अतिसुंदर भाव
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बहुत बहुत धन्यवाद
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पुराने मित्रों पर बहुत सुंदर और सच्ची कविता । लाजवाब अभिव्यक्ति
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बहुत बहुत धन्यवाद
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बहुत उम्दा रचना
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बहुत बहुत धन्यवाद
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