मेरे मन की उमंगें

खिल रही है धूप
दिन में तो जरा राहत सी है,
रात काटूं किस तरह से
भीति की आहट सी है।
आपको मौसम सुहाना
लग रहा होगा भले ही
पर मेरे मन की उमंगें
आज कुछ आहत सी हैं।
वो गए लौटे नहीं फिर
जो विदा दिल से किये
आज उनके प्रति फिर से
उग रही चाहत सी है।
आप इस शक की इस नजर से
देखना मत इस तरफ
अब भी मेरे दिल परतें
श्वेत से कागद सी हैं।
राग से करके किनारा
प्रेम को कुछ भी समझा
आज क्यों लगने लगा
ये बात कुछ जायज सी है।
खिल रही है धूप
दिन में तो जरा राहत सी है,
रात काटूं किस तरह से
भीति की आहट सी है।
——– डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय।

Comments

5 responses to “मेरे मन की उमंगें”

  1. मन के भावों को शब्दों के माध्यम से उकेरती सुंदर शिल्प के साथ सजी रचना

  2. Geeta kumari

    कवि के हृदय के भावों का खूबसूरती से वर्णन करती हुई
    चिर-परिचित लय के साथ सुन्दर शिल्प से सुसज्जित
    बहुत सुंदर कविता

  3. बहुत ही सुंदर पंक्तियां

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