बेटी और पिता सैर पर जा रहे थे
मधुर संगीत था कोई गीत
गा रहे थे..
होंठों पर दोनों के तसल्ली भरी मुस्कान थी,
बेटी अपने पापा की जान थी..
सैर करते समय एक रास्ते में पुल आया
पिता ने बेटी को प्यार से समझाया
मेरा हाथ पकड़ लो बेटी पुल है
और नीचे गहरी नदी,
बेटी ने कहा नहीं पापा
मैं आपका हाथ नहीं पकड़ूंगी,
आप ही मेरा हाथ पकड़ लो
पिता हँस पड़े और कहने लगे
उसमें क्या अन्तर है ?
चाहे मैं तुम्हारा हाथ पकड़ लूं
चाहें तुम मेरा पकड़ लो…
बेटी ने कहा अन्तर है पापा !
कोई बात हुई तो मैं आपका हाथ छोंड़ भी सकती हूँ,
पर आप चाहे कुछ भी हो जाए
मेरा हाथ नहीं छोंड़ोगे…
*बेटी का विश्वास*
Comments
4 responses to “*बेटी का विश्वास*”
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वाह, बहुत सुंदर ।यही तो है माता या पिता अपनी संतान को कभी मुसीबत में नहीं छोड़ेंगे इस बात को बताती हुई प्रज्ञा जी की सुन्दर रचना
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जी बिल्कुल धन्यवाद दी
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अतिसुंदर भाव
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