मैं, मैं न रहूँ !

खुशहाल रहे हर कोई कर सकें तुम्हारा बन्दन।
महक उठे घर आँगन, हे नववर्ष! तुम्हारा अभिनन्दन।।
दमक उठे जीवन जिससे
वो मैं मलयज, गंधसार बनूँ !
उपवास करे जो रब का
उस व्रती की मैं रफ़्तार बनूँ !
सिंचित हो जिससे मरूभूमि
उस सारंग की धार बनूँ !
दिव्यांगता से त्रस्ति नर के
कम्पित जिस्म की ढाल बनूँ !
मैं, मैं ना रहूँ,
हारे- निराश हुए मन की,
आश बनूँ !
बिगत वर्ष में में
जिनका अबादान मिला
कृतज्ञता ज्ञापित,
उनकी मैं शुक्रगुजार बनूँ!
मुकाम कैसा भी आये
पर मन में थकान न आये
हे ईश! हर मुश्किल में
संभलने का समाधान बनूँ!

Comments

10 responses to “मैं, मैं न रहूँ !”

  1. Suman Kumari

    “रफ़्तार”
    भूलवश
    “अफ्ताऱ”
    पढ़ा जाये ।

  2. बहुत सुन्दर रचना, उत्तम अभिव्यक्ति

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

  3. Anu Singla

    Very nice

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

  4. Geeta kumari

    “महक उठे घर आँगन, हे नववर्ष! तुम्हारा अभिनन्दन।।
    दमक उठे जीवन जिससे”
    बहुत सुंदर पंक्तियां , बहुत सुंदर कविता

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद गीता जी ।

  5. Rajeev Ranjan Avatar
    Rajeev Ranjan

    bahut suder kavita
    suman jee
    दमक उठे जीवन जिससे
    वो मैं मलयज, गंधसार बनूँ !
    उपवास करे जो रब का
    उस व्रती की मैं रफ़्तार बनूँ !
    सिंचित हो जिससे मरूभूमि
    उस सारंग की धार बनूँ !

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