मासूम बचपन

बारिश में भीगते-भागते
खिलखिलाते वो दो बच्चे
ना सिर पर छतरी,
ना तन पर कोई रेनकोट
तेज़ हुई बारिश तो,
बैठ गए लेकर एक दीवार की ओट
चेहरे पर हंसी की फुलझड़ी
बालों से टपक रही थी
मोतियों की लड़ी
भीग कर भी खिलखिला रहे
दिख रहा ना कहीं कोई ग़म,
देख-देख मैं सोच रही थी
यही तो है मासूम बचपन
_____✍️गीता

Comments

12 responses to “मासूम बचपन”

  1. बहुत ही यथार्थ समाया है आपकी इस रचना में।

    1. Geeta kumari

      समीक्षा हेतु आभार पीयूष जी

  2. बहुत सुन्दर रचना

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत आभार कमला जी

  3. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बहुत खूब

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी🙏

  4. बहुत सुंदर और लाजवाब रचना है।

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत आभार सर

  5. सच को उजागर करती कविता

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद चंद्रा जी

  6. Satish Pandey

    इस कविता में कवि गीता जी के द्वारा मासूम बचपन के सच को बेबाकी से प्रस्तुत किया गया है। यह कविता दर्शाती है कि जीवन, समाज और आसपास घट रहे के प्रति कवि का गहरा सरोकार है। कवि की शैली चिंतन-प्रशस्त है। परेशानी में भी खुश रहने की आकांक्षा है। कवि की वेदनामय दृष्टि को सहजता से महसूस किया जा सकता है। आम जीवन से उपजी इस कविता की भाषा आम जीवन की भाषा है। बहुत खूब।

    1. Geeta kumari

      कविता की इतनी सुन्दर समीक्षा की है सर आपने , कि मेरे हृदय के भावों को ही व्यक्त कर दिया भावों को इतनी अच्छी तरह से समझने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी बहुत-बहुत आभार

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