खुद खुश रहना औऱ सभी को
खुश रखना हो जीवन का पथ,
याद रखो नश्वर है जीवन
मिट जाना है बस इसका सच।
तेरा-मेरा मेरा-तेरा
कहते-कहते बीते पल-क्षण
अंत समय तक समझ न पाया,
जीवन का सच्चा सच यह मन।
चैन गंवा कर खूब कमाया,
जमा किया जो खाते में धन,
खाने तक का समय नहीं था,
जीवन भर का था पागलपन।
कुछ भी हाथ नहीं रहता है
आशा में रह जाता है सब
अतः देखकर यह सारा सच
खुश रहने की ठानो तुम अब।
———- चौपाई छन्द में रचना।
————– डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय
चैन गंवा कर खूब कमाया (चौपाई छन्द)
Comments
6 responses to “चैन गंवा कर खूब कमाया (चौपाई छन्द)”
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जीवन की सच्चाई को बहुत ही सुंदर तरीके से समझाया है कवि सतीश जी ने अपनी इस रचना में। यही होता है । जीवन का चक्र यूं ही घूमता रहता है। जीवन की सच्चाइयों के निकट , छंद बद्ध शैली में सुंदर शिल्प और भाव लिए बहुत ही सुंदर कविता
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बहुत ही शानदार कविता है सर
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वाह बहुत ही गंभीर रचना का सृजन चैन गवाकर खूब कमाया
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बहुत सुंदर 👌👌👌
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बहुत खूबसूरत
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अतिसुंदर भाव
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