महफिल

महफिल
———-
महफिल में हंसते चेहरे भी. …
अक्सर बेचैन से रहते हैं,
वह हंसते-हंसते जीते हैं
आंसुओं को भीतर पीते हैं।

महफिल में रौनक छा जाती …
जब प्रेम के नग्मे बजते हैं,
कुछ यादों में खोए रहते हैं
कुछ गमों को पीते रहते हैं।

आबाद हो महफिल कितनी भी..
मन में वीरानी रहती है,
लोगों के बीच में रहकर भी,
यादें आती जाती रहती हैं।

यह नशा बहुत ही जालिम है…
बर्बाद ये दिल को करता है,
महफिल में हंसकर गाकर भी दिल खोया खोया रहता है।

निमिषा सिंघल

स्वरचित/मौलिक
रचना #निमिषा सिंघल

Comments

One response to “महफिल”

Leave a Reply

New Report

Close