मुक्तक-कवि का धर्म
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कवि का कोई
धर्म नहीं हो सकता है,
मंदिर मस्जिद चर्चो में
भगवान नहीं हो सकता है,
दुख को दुख कहता है जो
सुख को सुख कहता है जो
खुद के ,चाहे औरों पर हो,
सबके आंसू को आंसू समझे,
लाख मुसीबत आए उस पर,
सत्य के सिवा कुछ ना समझे
जो मानव को नीच बताएं
वह इंसान नहीं हो सकता है,
गाली बकते नारी को जो,
ईश्वर से आशीष नहीं पा सकता है,
सम्मान करो अपमान नहीं
इंसान बनो भगवान नहीं
भक्त-मित्र बनो सुदामा जैसे,
मत भक्त बनो रावण जैसे,
गीत लिखो या प्रीत लिखो,
हार लिखो या जीत लिखो,
लिखना जो भी सोच समझ के लिख
देश धर्म जनता के सब हित में लिख
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—-ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’
कवि का धर्म
Comments
8 responses to “कवि का धर्म”
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कवि ऋषि जी की यह बहुत प्रेरणादायक रचना है। इसमें कवि कर्म को देशहित, समाजहित में लिखने को प्रेरित किया गया है। कवि के हृदय में एकत्रित उच्च भावनाएं, विचार और संवेदनाएं अपनी प्रखरता से अभिव्यक्त हुई हैं। युवा कवि की बेहतरीन सोच है यह कविता। सत्य की ओर प्रेरित करने वाली, नारी के सम्मान को स्थापित करती चहुमुंखी अभिव्यक्ति है यह कविता।
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बहुत सुंदर समीक्षा सर ,हम आपका हृदय से आभार प्रकट करता हूं
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बहुत सुन्दर रचना
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धन्यवाद सर
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“लिखना जो भी सोच समझ के लिखदेश धर्म जनता के सब हित में लिख “।कवि का धर्म समझाते हुए कवि ऋषि जी की बहुत प्रेरणादायक रचना , जिसमें नारी के सम्मान की बात भी कही गई है और देशहित की भी । बहुत सुंदर कविता उत्तम लेखन
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धन्यवाद
बहुत सुंदर समीक्षा
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अतिसुंदर भाव
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धन्यवाद सर
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