उजालो पे हो अख्तियार तेरा

यह दर्द मेरा
लिखा है जिसपर नाम तेरा
ढूँढे जो कोई हमदर्द
बेदर्द में शामिल नाम तेरा।
सही अगर तुम हो
नाम, गलत होगा किसका
धर्म के पथ पर चलने वाले
कर्महीन सही होगा नाम तेरा।
मेरे आश की हर कलियाँ
जुङकर फूल बनने को आतुर
तेरे सिवा कोई चाह नहीं
हर उम्मीद पे है लिखा नाम तेरा।
शिकायत की कोई चाह नहीं
यह दम निकले कोई आह नहीं
ढूँढ रहे चैन, मिले कहीं ठौर नहीं
अब खुशी कहीं है और नहीं
तिमिर मेरे, उजालो पे हो अख्तियार तेरा।

Comments

7 responses to “उजालो पे हो अख्तियार तेरा”

    1. ਬਹੁਤ ਵਧੀਆ ਨਤੀਜੇ ਸਾਹਮਣੇ ਆਉਣ ਗੇ

    2. सादर धन्यवाद

    3. सूरज जी मुझे आपकी टिप्पणी समझ में नहीं आई

    4. सादर धन्यवाद

  1. मार्मिक भाव की उत्तम प्रस्तुति

  2. बहुत खूब, अति सुन्दर अभिव्यक्ति

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