देख लिया दुनिया तुझको
अब और नहीं कुछ चाहत है,
हर तरफ चेहरे पर एक चेहरा है
अपनों से ही हर जन आहत है।
अब और फरेब की गुंजाइश नहीं
यहां अपनापन की लगी नुमाइश है
ढिठता की हद पार किए
दिखती नही शरमाहट है।
देख लिया
Comments
6 responses to “देख लिया”
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कवि सुमन जी की बेहतरीन प्रस्तुति। उत्तम रचना
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सादर आभार सर
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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सादर धन्यवाद
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सादर धन्यवाद
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अतिसुंदर भाव
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